शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

'द्रोण' का 'किडनैप'

शुक्रवार का दिन. मैदान में तीन योद्धा. हर योद्धा के पास अलग-अलग रणनीतिक कौशल हैं. निर्णायक कलाबाजी में कौन बाज़ी मारेगा, कोई नहीं जानता. एक ओर जूनियर बी अभिनीत 'द्रोण' है तो दूसरी और युवा दिलों के धड़कन इमरान खान की 'किडनैप' . दोनों की लड़ाई को दिलचस्प बनाने के लिए पड़ोसी मुल्क की 'रामचंद्र पाकिस्तानी' की मदद ली गयी है. महासंग्राम शुरू हो गया है. पहला दिन और फर्स्ट शो. और थोड़ी देर में खत्म हो गया सारा सस्पेंस. 'किडनैप' हिट रही, 'द्रोण' बुरी तरह पिटी और 'रामचंद्र पाकिस्तानी' को अपने क्लास के दर्शक मिले.
मीडिया ने किडनैप को सराहा. इमरान खान और मुन्ना भाई यानी संजय दत्त की खूब वाहवाही हुई. पर सबसे ज्यादा सुर्खियाँ बटोर ले गई 'यहाँ' मूवी से करियर की शुरुआत करने वाली hott गर्ल मीनिषा लाम्बा ने. बिकनी पोज में सीन देकर युवाओं का दिल चुरा ले गई वो. 'जिंदा' मूवी की थीम से मिलती-जुलती 'किडनैप' को पहले दिन खूब दर्शक मिले. पर द्रोण में दिनकर की उक्ती काम कर गई. 'सौभाग्य न सब दिन सोता है, देख आगे क्या होता है....' अभि के लिए दुर्भाग्य बनकर आई. कहाँ वे कृष के नायक रहे ऋतिक रौशन की तरह एक महानायक बनने का ख्वाब देख रहे थे, पर वे 'बस इतना सा ख्वाब' की तरह ख्वाब ही देखते रहे. प्रियंका चोपडा उनकी अंगरक्षक बनी. पर फ़िल्म में प्रियंका अंगरक्षक कम, शरीर की नुमाइश ज्यादा करते दिखी. बाकी का कचूमर केके मेनन ने दुष्टात्माओं का मसीहा बनकर कर दिया.
पर कहते हैं ना, दो बिल्ली की लडाई में तीसरा कोई कैसी बाजी मार लेता है, कोई इनसे सीखे. दोनों मूवी में रामचंद्र पाकिस्तानी दिल को सकूं देती है. एक सच्ची घटना पर आधारीत मूवी दिल को स्पर्श करती है. नंदिता ने अपना बेहतरीन अभिनय दिया है. खैर द्रोण, किडनैप और रामचंद्र पाकिस्तानी की जंग जारी है और ये अगले हफ्ते तक जारी रहेगी...

शनिवार, 27 सितंबर 2008

कितने मरे...

...बम ब्लास्ट और दिल्ली दहल उठी. महरौली के सराय मोड़ मार्केट में दो धमाके हुए. एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों की पोल खुली. दो सप्ताह के भीतर दो ब्लास्ट कर आतंकियों ने अपने मंसूबे दिखा दिए. सरकारी आंकडों पर नजर दे तो इस धमाके में दो लोगों की मौत हुई और करीब दो दर्जन लोग घायल हुए. यह धमाका शनिवार, तारीख २७ सितम्बर २००८ को हुआ. शुरूआत में लोगों को लगा की यह हादसा गैस सिलिंडर के फटने से हुआ. पर यह जल्द ही स्पष्ट हो गया कि यह किसी सुनियोजित आतंकी साजिश का नतीजा है. खैर ब्लास्ट के बाद मरने वालों की संख्या को लेकर अभी तक कुछ स्पष्ट नहीं हो पाया है.
पहली बार जब ख़बर आयी तो एक टीवी चैनल ने मृतकों की संख्या चार बताई तो किसी ने तीन. दूसरे चैनल पर भी मृतकों की संख्या को लेकर इक-दो का अन्तर रहा. सभी चैनल वालों का न्यूज़ कार्यक्रम फुस्स हो गया और बाज की तरह वे इस ब्लास्ट वाली न्यूज़ पर झपट पड़े. मृतकों और घायलों के लेकर सभी चैनल वालों में होड़ लगी रही. उस समय कोई अख़बार भी नहीं छप सकता था इसलिए अख़बार के इन्टरनेट संस्करण में इसको लेकर संशय बनी रही. कुछ लोग तो आँख मूंदकर मरने वालों की संख्या चार तक लेकर पहुँच गए. बाद में भी मृतकों की संख्या को लेकर कयाशबजी चलती रही. आखिरकार सरकार ने मरनेवालों की संख्या दो बताई. और सभी टीवी और अखबारों ने मृतकों की संख्या दो बताकर इतिश्री कर दिया. पर एक सवाल अनुतरीत ही रह गया कि आख़िर इस ब्लास्ट में कितने मरे????????????

शनिवार, 13 सितंबर 2008

सफर

सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम निकल सको तो चलो
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिराके अगर तुम संभल सको, तो चलो।

शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

चुप रहो कर्स्टन भईया

हमारे कर्स्टन भईया बोले कि माही यानी धोनी महोदय अब टीम इंडिया के कप्तान बनने लायक हो गए हैं। इसलिए उन्हें यह ताज सौंप देना चाहिए। पर ये क्या, कर्स्टन भईया के बोलते ही भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड गुस्से शेर की भांति गुर्रा उठा. उसने तत्काल तुगलकी फरमान जारी कर दिया. बोर्ड के अधिकारी निरंजन शाह गुर्राए हे कर्स्टन भईया. ज्यादा मत बोलो आप. नहीं तो ठीक नहीं होगा आपके लिए. अपने सीमा से बाहर बोलिएगा तो हमसे बुरा कोई ना होगा.
आख़िर शाहजी बोले भी तो क्यों नहीं। आख़िर हमारे स्टार खिलाड़ियों के खिलाफ कौन बोल सकता है। खासकर बात जब स्टार चौकरी खिलाड़ियों की हो तो फिर हिम्मत किसकी बनती है. कर्स्टन भईया का बस इतना ही दोष था कि उन्होंने टीम में पिछले रिकॉर्ड की अपेक्षा अभी के प्रदर्शन को टीम में आने का पैमाना बताया था. वे भूल गए हम इंडियन ज्यादा स्टार वाले खिलाड़ी को महत्व देते हैं.
बात यदि सचिन की हो तो पाँच स्टार. और फ़िर बात सौरभ-राहुल की हो तो तीन स्टार. दो स्टार वाले श्रेणी में लक्ष्मण और कुंबले वाले खिलाड़ी आते हैं. खैर वही हुआ और हमारे कर्स्टन भईया ने अपनी जुबान बंद करने में ही भलाई समझी. अब फिर से वही स्टार से भरी टीम इंडिया ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों के खिलाफ खेलेगी. हम एक-दो टेस्ट सीरीज़ हारेंगे और कप्तानी पर बहस होगी. पर इससे टीम को कितना फायदा होगा, कोई नहीं जानना चाहता. आख़िर क्यों? है इसका जवाब किसी के पास...

बुधवार, 13 अगस्त 2008

खूब लड़ी साइना.....

बीजिंग ओलंपिक में एक और पदक की आश लगाए बैठे भारतीय उम्मीद को उस समय जबरदस्त झटका लगा, जब नई भारतीय सनसनी साइना नेहवाल (टेनिस वाली सानिया मिर्जा नहीं) bandminton के एकल मुकाबलों से बाहर हो गयी। अन्तिम चार के मुकाबले में साइना को इंडोनेशिया की मारिया ने २६-२८, १४-२१, १५-२१ से मात दी। इस हार के साथ ही साइना का विजय अभियान थम गया और भारतीय उम्मीद की किरण बुझ गयी। ये आंकडें भले ही हार-जीत का गाथा (मार्च पोस्ट के दौरान सानिया मिर्जा द्वारा साडी न पहनने पर उठे बवाल) लिख गया हो, पर ओलंपिक अभियान में साइना ने सिर्फ़ तीन सेट ही गंवाया.
वैसे बीजिंग ओलंपिक में साइना से आलोचकों को कोई खास उम्मीद नहीं थी। पर जिस तरह उसने प्रारंभिक मुकाबलों में अपने से शीर्ष वरीय खिलाड़ियों को मात दी, उससे भारतीयों की उम्मीद की किरण तो जग ही गयी थी। पर अनुभव और पॉवर की कमी के कारण आखिरकार साइना को हथियार डालने पड़े। पर उसने आसानी से हार नहीं मानी. उसने दमख़म से अपनी चुनौती पेश की, मैदान पर पूरा जोर लगाया और अंततः एक खिलाडी की तरह हार को गले लगाया.
यह उन खिलाड़ियों के लिए एक सबक और प्रेरणा बन सकती है, जिन्होंने बिना लड़े ही मैदान में हथियार डाल दिए। मसलन भारतीय सनसनी सानिया मिर्जा को ही लें। विज्ञापनों और सरकारी अनुदानों की बात करें तो वे इसे पाने वालों में टॉप-१ का खिताब पा सकती है। भारतीयों को उनसे उम्मीदें भी बहुत थी, पर आखिरी समय में हाथ की चोट के कारण सानिया टूर्नामेंट से हट गयी। टेनिस के एकल मुकाबले में तो उम्मीद तो टूटी ही, डबल्स मुकाबलों में भी टिमटिमाती हुई आशा बुझती नज़र आयी.
अब सानिया कुछ दिनों बाद इंडिया लौट आएंगी. एक प्रेस कांफ्रेंस होगा और कैमरे पर अपनी पक्ष पेश करेंगी. और फिर कुछ मिनटों में ही मूवी खत्म हो जायेगी. इसी तरह अन्य खिलाडी भी ऐसा अभिनय करेंगे. और फिर होगा अगले चार साल का अग्रिम वादा. इस वादे को पूरा करने के लिए कई तरह की बाते की जाएंगी. सरकार और जनता से राहत की अपील होगी और खत्म हो जाएगा पदकों का अकाल. पता नहीं क्यों इस तरह के सिलसिले को हम अपना समर्थन देते हैं. और कब तक देते रहेंगे अपना समर्थन...

गुरुवार, 24 जुलाई 2008

संगीत का जादू....

सात सुरों का जादू यानी संगीत हमारी आत्मा है। हम जब भी उदास होते हैं तो संगीत की बस एक मधुर धुन हमें ग़मों से हजारों मील दूर ले जाती है जहाँ हमारी रूह एक अलग शख्सियत में ढल जाती है। जहाँ हमारा कोई अपना अस्तित्व नहीं होता है और हम बस खुदा के बन्दे रहते हैं। उस नेकनीयती से हमारा दिल पाक-साफ होता है और प्यारी सी मुस्कान हमें अपनों के पास ले जाती है.
पर आज मैं संगीत का एक अलग अहसास सुनाने जा रहा हूँ जिसने इस जादू के प्रति मेरा सारा ख्याल ही बदल दिया। हर बार की तरह गरमी की छुट्टियों में एक बार अपने घर गया था। बचपन से ही मुझे गाना सुनने का बहुत शौक रहा है और मैंने इसे सदा जिन्दा रखने की कोशिश की है। मेरे दालान में दो बैल बंधे हुए थे.
अचानक मैंने देखा कि एक बैल काफी उग्र हो गया और उसने दूसरे बैल को मारना शुरू कर दिया। जब मेरे चाचा उस बैल को बचाने पहुंचे तो उस बैल ने उनपर भी झपट्टा मारा। मेरे चाचा सहम कर पीछे हट गए। पता नहीं क्यों मेरे दिमाग में एक ख्याल आया। मैंने धीरे से रेडियो को बैल के समीप ले गया। उस समय रेडियो में कोई पुराना गाना बज रहा था. बस, सच पूछिये पता नहीं कैसे बैल का गुस्सा छू-मंतर हो गया. मैंने धीरे से उसके गले पर हाथ फेरा. और अब बैल पहले की ही तरह नाद में पुआल चबा रहा था.
एक नन्हें से बच्चे की मुस्कान का हर कोई कायल होता है. कहतें हैं कि दो-तीन साल का बच्चा प्रकृति के मुताबिक हँसता है और प्रकृति के अनुसार रोता है. उसकी निश्छल हँसी हमें अपने बचपन में ले जाती है जहाँ हमने भी कभी मां का पल्लू पकरकर कभी रोया था. कभी जानबूझकर अपने बहनों के साथ झगरा भी किया था ताकि बहन के हिस्से का थोरा सा प्यार मिले. और वह प्यार हमें मिलता था मां की लोरी में. हर कोई उस लोरी पर अपने अधिकार जमाना चाहता था. आख़िर कोई क्यों ना करे. तो ये था लोरी के संगीत का जादू. जिस किसी ने लोक संगीत का स्वाद चखा हो वही उसका सुगंध बता सकता है. हर दिल अजीज और प्यारा सा अहसास है ये.

सोमवार, 14 जुलाई 2008

छूआछूत का नया रोग

छूआछूत का रोग सबसे खतरनाक रोग माना जाता है। पर यदि इससे हमारी कोई हित सधता हो तो भला हम भारतीय इससे पीछे नहीं रहते। स्वहित की बात हो और हम इसे अपने लिए नहीं अपनाएं, ये तो हो ही नहीं सकता। वैसे तो हमारे देश में छूआछूत की कई महामारियां मौजूद है. पर हाल के दिनों में जगह झपटने की गंभीर महामारी ने सभी को पीछे छोर दिया है.
ट्रेन हो या बस सीट को लेकर अपने यहाँ हमेशा से नोकझोंक चलती रही है। चाहे आप कितने भद्र पुरूष हों या फ़िर नामी बदमाश। ट्रेन और अन्य जगह आपको अपने सीट के लिए उग्र होना ही परता है. यदि आप सीधे-साधे हैं तो फिर आप अपने सीट से तो हाथ धोकर ही बैठ जाइये. ट्रेन में तो यात्रा करते वक्त रिज़र्व सीट के लिए भी जद्दोजहद करनी परती है. कई बार तो रेलवे टीटी तक फरियाद पहुँचने पर आग्रह अनसुनी हो जाती है.पर इस बार तो हद ही हो गयी.
अब तो ऑफिस में भी जगह के लिए मारामारी शुरू हो गयी. हमारे भाई साहब एक नामी मीडिया ग्रुप में काम करते हैं. वे जिस केबिन में बैठते हैं, उसके ठीक सामने दो लोग अपनी सीट खाली कर दूसरी जगह शिफ्ट कर गए। उनलोगों के खाली किए हुए बमुश्किल कुछ ही मिनट बीते होंगे की हमारे एक सहकर्मी की उसपर नज़र पर गयी।और फिर बस होना क्या था।
ये तीव्र सूचना हमारे बॉस तक पहुँच गयी। और बॉस भी तो मानो इसे लपकने के लिए तैयार थे। उन्होंने हमलोगों को भरोसा दिलाया कि हमलोग चिंता नहीं करें, ये खास जगह हमारी ही होगी। कोई नहीं जानता कि इस चमत्कार को मैं कब हकीक़त में बदल दूंगा. बॉस के इस दिलासे से तो हमलोग फूलकर कुप्पा हो गए. सबके मन में लड्डू फूटने लगे और खुशी का तो ठिकाना ही क्या.
पर ये रोग हमारे यहाँ तक ठीक रहे तो सही, पर जब दुसरे डिपार्टमेन्ट के लोग भी इसपर नज़र गराने लगे तो मानो हलचल मच जाएगी. पर खुदा का शुक्र है की अभी तक किसी की भी इसपर नज़र नहीं परी है और वो जगह है. हाँ तो खुदा के बन्दों खुशी मनाओ कि हम भी इस छूआछूत के शिकार हो गएँ हैं....