‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना....’ कौमी तराना इंसानों के लिए भूली-बिसरी यादें बन गया है। अब तो इस पर नक्सल और आतंक के स्याह रंग ने इंसानों को ही एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया है। कभी दंतेवाड़ा में दर्जनों सिपाहियों की हत्या होती है तो कभी इराक, अफगानिस्तान में आतंकी आत्मघाती धमाके कर सैकड़ों लोगों को मौत की नींद में सुला देते हैं।ऐसी घटनाएं हिंदुस्तान के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है। नक्सल और आतंक नामक दो ‘अजगर’ आम लोगों को निगलने के लिए आतुर है। मौजूदा परिदृश्य में ये एक ही सिक्के दो पहलू हैं। इनमें से एक हमारा ही शोषित बंधु है जो अपने भाई-बहनों का कत्लेआम कर रहा है। वहीं दूसरे को ‘इंपोर्ट एनेमी’ कह सकते हैं। इन दोनों का एकमात्र उद्देश्य है लोगों में दहशत और खौफ पैदा करना। यह बहुत ही आश्चर्य की बात है जिन उद्देश्य को लेकर इनका जन्म हुआ, वह बिल्कुल गायब दिखता है।1967 में सशक्त क्रांति के माध्यम से किसानों और मजदूरों को उनका हक दिलाने के लिए पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक स्थान पर नक्सलवाद की शुरुआत हुई। इनके सिद्धांत मार्क्सवाद से प्रभावित थे जबकि तरीके माओवाद से। चीन में सशक्त क्रांति के नेता माओ का कहना था राजनीतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। वहीं आतंक का भी बहुत कुछ इसी से मिलता-जुलता स्वरूप है। सबसे खतरनाक बात यह है कि आतंकियों में सबसे अधिक तादाद उन गुमराह मुसलमानों की है जो खुद को इस्लाम का सच्चा सिपाही मानते हैं। उनकी नजर में मूर्तिपूजक और ब्याज लेने वाले लोग काफिर हैं।उनके दिल और दिमाग को इस तरह से घुट्ठी पिलाई गई है कि काफिरों का कत्लेआम करने के बाद उन्हें जन्नत नसीब होगी। इस बेहोशी में वे स्वधर्मी को भी गोली से भूनने में फक्र महसूस करते हैं। आज नक्सलियों और आतंकियों का सफलता पैमाना शवों का आंकड़ा बन गया है। सरकारी आंकड़े कहते हैं पिछले साल आतंकियों की गोली से 133 लोगों ने अपनी जान गंवाई। वहीं, नक्सलियों ने 908 लोगों को मौत की घाट उतार डाला। इससे साफ है कि देश के सामने आतंकियों से अधिक खतरा नक्सलियों से है।सबसे दुख की बात यह आम लोगों के स्वघोषित पहरेदार उन्हें की मौत की नींद सुलाने में सबसे आगे हैं। आज देश के 28 राज्यों से 23 राज्य इन नक्सलियों के निशाने पर हैं। इन राज्यों में उन्हें न सिर्फ जनसमर्थन हासिल है, बल्कि हथियार भी यहीं से हासिल होते हैं। इसलिए भारत सरकार को सचेत रहने की जरूरत है कि आतंकवाद पर चिल्लाने के बदले आतंक और नक्सल के बीच महीन लकीर को पहचान कर उसका नेस्तनाबूद करें।
आखिर एक बार फिर क्रिकेट की हार हुई। अब यह बिल्कुल तय हो गया है कि 27 फरवरी को कोलकाता के ईडन गार्डंस में भारत-इंग्लैंड के बीच मैच नहीं होगा। पवार और डालमिया के बीच लड़ाई में भले ही किसी की हार-जीत हुई हो, पर पराजय तो क्रिकेट की हुई। आखिर यह समझ से परे है कि जिस आईसीसी का चीफ एक भारतीय हो, वही संस्था ईडन से मैच छीनने की बात करता है। क्या किसी व्यक्ति का अहम राज्य और देश की इज्जत से भी बड़ा है? दुख की बात यह है कि इनमें से आज एक संविधान की शपथ लेकर केंद्र में मंत्री बनकर मजा लूट रहा है।यह बड़े आश्चर्य की बात है कि ईडन गार्डंस में तैयारियों को लेकर बीसीसीआई और कैब (क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल) के माथे पर तब तक नहीं बल पड़े, जब तक आईसीसी ने तैयारियों पर सवाल नहीं उठाए। एक बार मैच हाथ से फिसलता देख बोर्ड के आला सुखभोगी अधिकारी के कान खड़े हो गए। मीडिया और आम लोगों में जब थू-थू होने के बाद बीसीसीआई ने आईसीसी से और एक सप्ताह देने की गुहार लगाई। पर, यहां भी पवार का दिल नहीं पसीजा। कोलकाता के क्रिकेट प्रेमियों पर बाउंसर फेंक सीधे उन्हें बोल्ड कर दिया।तैयारियों को लेकर कुछ ही ऐसी स्थिति अन्य क्रिकेट स्टेडियमों की भी की थी, पर उन्हें तो एक सप्ताह की मोहलत मिल गई। ये चार स्टेडियम इन शहरों में स्थित है-कोलंबो, हंबनबोटा, पाल्लिकेले, वानखेड़े। इनमें से वानखेड़े का स्टेडियम शरद पवार के गृह शहर मुंबई में है। तो फिर किसकी हिम्मत है कि वह मुंबई से मैच छिन लें।सच में क्रिकेट की इससे बड़ी दुर्दशा और क्या हो सकती थी? और खासकर जब क्रिकेट का महाकुंभ भारत में हो तो फिर यह खेल प्रशंसकों के लिए दर्दनाक जख्म के सिवा क्या है? सच में जब कहीं राजनीति घुसती है तो वह घुन की तरह उसे चाट-चाटकर खत्म कर देती है। कुछ ऐसा ही लोग क्रिकेट प्रशासक बनकर खेल प्रेमियों को जख्मी कर उन्हें रूलाने पर उतारू हैं।
उधर यशवंत सोनावने जल रहे थे और इधर समाज के खूंखार दरिंदे अट्टाहस कर रहे थे। कर्त्तव्य के पालन में एक और मंजूनाथ की बलि चढ़ गई और सरकार कान में तेल डाले सो रही है। इसी तेल को बचाने के लिए सोनावने मौत के मुंह में चले गए। उनका कसूर क्या था। क्या तेल की चोरी को रोकना गुनाह था या फिर ड्यूटी का सच्चे मन से पालन करना गलत था। दरअसल हमारा उद्देश्य यहां आपको गलत और सही की पहचान कराना नहीं है। यहां बात ये उठती है कि आखिर कब तक सरकार अपनी मजे की नींद के लिए मंजूनाथ और सोनावने जैसे कर्त्तव्य निष्ठों की बलि चढ़ाती रहेगी। हालांकि सोनावने को जिंदा जलाने का कृत्य करने वाले गुनहगार गिरफ्तार हो चुके हैं लेकिन इन घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए हमे नहीं लगता कि यह पर्याप्त कदम है।सोनावने का दोष बस यही था कि उन्होंने तेल माफियाओं की कुत्सित गतिविधियों पर लगाम कसने का साहस जुटाया। यदि उनके समर्थन में महाराष्ट्र के 17 लाख राजपत्रित कर्मचारी तालाबंद का ऐलान कर रहे हैं तो सरकार के कान पर अब जाकर जूं रेंगी है। क्या हमारी सरकार और उसकी नीतियां इतनी कमजोर हो गई है कि किसी ईमानदार ऑफिसर की मौत के बाद ही उसमें जान आती है? बस ऐसे ही हमारे समाज के नीति-निर्माता इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के होनहार ऑफिसर मंजूनाथ की मौत के बाद आत्मा जाग उठी थी! मंजूनाथ की भी गलती यही थी कि उसने तेल माफियाओं पर लगाम कसने की कोशिश की थी। परिणामस्वरूप 19 नवंबर 2005 को तेल तस्करों ने गोली मारकर मौत की नींद सुला दी।घोटालों और कर्त्तव्यनिष्ठता की पारस्परिक गाथा यहीं खत्म नहीं होती है। अरबों रुपए के घोटाले पर से परदा उठाने वाली कैग पर ही उंगली क्यों उठाई जाती है? हैरानी और शर्म की बात यह है कि संविधान की शपथ लेकर केंद्रीय मंत्री ही इस संवैधानिक संस्था पर प्रश्नचिह्न लगाने से नहीं चूकते?बात यहीं खत्म नहीं होती..। जब इन घोटालेबाजों पर शिकंजा कसने की बारी आती है तो उनकी जात-पात की रामकहानी शुरू होती है। करोड़ों रुपए डकारने वाले ए राजा पहले तो किसी धांधली से साफ इनकार करते हैं। जब उनपर कानून का फंदा कसता है तो वे खुद को दलित उत्पीड़न का शिकार बताकर लोगों की सहानूभूति बटोरने का प्रयास में जुट जाते हैं।यदि ये सारी चीजें राजनीतिक और अफसरशाही संस्था से जुड़ी रहती तो दिल को थोड़ा रहम मिलता। पर, अब तो बेईमानी की गंध सबसे विश्वसनीय संस्था न्यायपालिक और आर्मी में भी फैल चुकी है। तभी तो कोई आर्मी का सीनियर ऑफिसर (पीके रथ) सेना के बहुमूल्य जमीन औने-पौने दाम पर किसी निजी बिल्डर के हाथों बेच देता है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस के रिश्तेदार देखते-देखते करोड़पति बन जाते हैं। इलाहाबाद कोर्ट के कुछ जजों पर उच्चतम न्यायालय के जज द्वारा सीधे उंगली उठाई जाती है।यदि हमारा समाज इन्हीं रास्तों पर चलता रहा तो एक दिन हमारी संस्कृति और सम्मान की मौत होनी तय है। पता नहीं ऐसा करके भारत के ‘महान लोग’ कितना खुश होंगे! पर, एक बात तो तय है कि इस तरह का हर एक कदम हमारे पूर्वजों के सपनों को खोखला करने में जुट गया है।
शायद वह सुनहरा दौर खत्म हो गया! जब भी हम या आप पीछे मुड़कर कुछ देखने की कोशिश करते हैं तो हमें कभी पथरीला राह दिखता है अथवा बंजर जमीन का टुकड़ा। एक अरसा बीत गया कि जब हम उन हरी-भरी भूमि पर खूबसूरत ख्वाब बुना करते थे। सपनों की दुनिया में सैर करने का तो अपना ही मजा है। बिना रोक-टोक के हर उस पल का जीवंत मजा लेना, इसका मुकाबला भला कौन कर सकता है। पर, यह क्या मंद-मंद समीर के अनचाहे झोंके ने उस सपने के शीशमहल को चकनाचूर कर दिया!!!!पता नहीं कैसे, जब नींद खुली तब तक सब कुछ तहस-नहस हो चुका था। सामने वही हकीकत का पाजामा, जिसे पहनकर मैं अपने बिस्तर पर थका मांदा लेटा हुआ था। शायद यही मेरी नीयति थी और मैं अधूरे ख्वाब का एक हिस्सा। कहने को तो यूं कई सारे बहाने गिना सकता हूं। मसलन, भाई मेरे पास समय नहीं है कि इस सपने को पूरा करने के लिए। क्या बस चंद लफ्ज बयां कर देने से ही आपकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? क्या आपका अस्तित्व लुप्त हो जाता है। नहीं न, तो फिर आप अपनी आंखें कब खोलिएगा। जरा, अपनी पलकें को इधर-उधर घुमाना तो शुरू कीजिए।अब हमें किसी ने नहीं डरना है। अपने ख्वाब को हकीकत की हरी-भरी धरा पर इसे फिर से बोना है। मेरा सपना है कि इस नदी को फिर से जिंदा करूं, जो मेरे आलस और उदासी के कारण मरने को चली थी। मैंने कभी खुद से वादा किया था कि मैं अपने ब्लॉग पर दिल और दुनिया की बातें लिखूंगा। इस जज्बात में आज से नए रंग भरने की कोशिश कर रहा हूं। मेरा मुझसे वादा है कि अपने इस ख्वाब में रंग-बिरंगे रंग डालकर इसे नायाब और बेहतरीन रूप दूंगा।
रिकॉर्डों के बादशाह की एक और छलांग। मुश्किल हालात में श्रीलंका के खिलाफ दोहरा शतक ठोका। कुल मिलाकर पांचवां दोहरा शतक। टेस्ट में 48 वीं सेंचुरी। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कुल 94 सेंचुरी (वनडे में 46 औट टेस्ट में 48 शतक)। यानी शतकों के सैकड़े से महज छह शतक दूर। पर रनों की भूख अभी भी बरकरार। सच में सचिन तो पुराने शराब की तरह और नशीले होते जा रहे हैं। प्रशंसकों के मुख से ‘क्रिकेट का भगवान’ यूं ही उवाच नहीं होता।हर पारी और रन के साथ एक अनोखा रिकॉर्ड उनके साथ जुड़ रहा है। ऐसा लगता है कि वे रिकॉर्डों के शिखर पर खड़े हों। मास्टर ब्लास्टर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे विपक्षी टीम के अलावा खुद के खिलाफ भी खेलते हैं। यानी मैच दर मैच में उनकी भूख बढ़ती ही जाती है। गुणगान गाथा के लिए यूं तो दुनिया के हर कोने में सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट आलोचक मौजूद हैं। पर एक आम क्रिकेट प्रेमी के लिए तो हर शॉट ही दर्शनीय है। उन्हें बल्लेबाजी करते देख ऐसा लगता है कि हाथ की लोच के साथ गेंद बल्ले को छूकर बाउंड्री को क्रॉस कर रही हो। और मैदान में मौजूद हर खिलाड़ी उसे बस निहार रहा हो। मैदान में खिलाड़ियों को भेदकर शॉट मारना मंत्रमुग्ध करता है। हर शॉट को आप निहारते रहेंगे और पता ही नहीं चलेगा कि किस शॉट से उसने पारी की शुरुआत की और किससे खत्म।वैसे तो उनकी कई खूबियां हमें लुभाती है। पर, एक बात जो उनमें खास है, वह है उनकी विनम्रता और सच्चाई। फील्ड के अंदर और बाहर वह हर प्लेयर के लिए आदर्श हैं। आप उन्हें रोजर फेडरर, पेले, ब्रैडमैन, कार्ल लुइस, पीट संप्रास जैसे महान खिलाड़ियों की अग्रिम पंक्ति में आंख मूंदकर शामिल कर सकते हैं। वैसे क्रिकेट का यह महान प्लेयर खुद टेनिस का बड़ा प्रशंसक है। खाली समय में आप उन्हें बिंबलडन का मैच का लुत्फ उठाते जरूर देखते होंगे। खैर सचिन का यह सफरनामा कुछ शब्दों में बयां करना मुश्किल है। एक प्रशंसक की तो यही दुआ है कि भारत का यह ‘कोहिनूर’ हमेशा क्रिकेटीय आकाशगंगा में चमकता रहे।
कैसे हो भाई? एकदम बिंदास। किसी-किसी को झक्कास भी कहते सुना होगा। ऐसा लगता है कि बिंदास और झक्कास एक ही मां के दो पूत हैं। खैर, जब किसी के मुंह से यह सुनते हैं तो चेहरे पर एक स्माइल तैर जाती है। आखिर हो भी क्यों न! इस शब्द ने अपनी सीमा से परे होकर एक अलग खूबसूरती दी है। वैसे भी आजकल हर कोई बिंदास दिखना चाहता है।आजकल इस बिंदास ने अपनी सीमा से परे भी अपना बसेरा खोज लिया है। देश-दुनिया की खबरें हो या फिर ग्लैमर की, आज हर जगह इसकी पूछ है। नौटंकी के मंच से मुंबइया सिनेमा के बड़े परदे तक इसकी धमक दिखती है। दूसरों को तो गोली मारिए, एक टीवी चैनल (यूटीवी बिंदास) ने तो अपना नाम भी बिंदास के साथ जोड़ रखा है। बात यहीं आकर खत्म नहीं होती है। अब तो बाबाओं के साथ उनके चेले भी बिंदास नजर आते हैं। टीवी पर दिखने-दिखाने को लेकर योग, ध्यान और प्रवचन का रूप अलग नजर आता है।किंगफिशर के कैलेंडर की मांग आज भी खूब है। डब्बू रतनानी जैसे फोटोग्राफरों के सामने दिलकश मॉडलों की खूबसूरती कैमरे के एंगल के साथ ही पल छिन बदलती है। यदि आपके कमरे में किंगफिशर का कैलेंडर हो तो दोस्तों की महफिल में आपकी रंगत कुछ और होती है, ठीक बिंदास जैसी। कुछ ऐसे भी खुशनसीब हैं जो इसका नयनसुख दूसरों के घरों में देखकर बुझाते हैं। जिनका पॉकेट अनुमति नहीं देता ऐसे भाग्यवान इंटरनेट पर अपनी प्यास बुझाते हैं।तसवीरों के दुनिया में बिंदास का अपना ही मजा और सजा है। मैग्जीन के कवर पेज पर आने के लिए खुद को न्यूड करना आजकल फैशन बन गया है। प्लेब्वॉय मैगजीन तो बस इसी के लिए जाना जाता है। यही बात पेटा (पीपुल फॉर द इथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स) के लिए फोटो शूट करने वाले हमारे फिल्मी कलाकारों के लिए भी आम है। पशुओं को बचाने के नाम पर खुद को नग्न करना इन फिल्मी हस्तियों के लिए बिंदासपन बन गया है।सिगरेट की कश लेते और बगल चलती लड़कियों पर कमेंट करना भी आजकल बिंदासपन का हिस्सा बन गया है। यदि आप दोस्तों की महफिल में खुद को अनर्गल बातों से दूर रखते हैं तो यह आपकी कमी मानी जाती है। शराब और शबाब को इसने अपने आगोश में ले लिया है। लंबी-चौड़ी रास्तों पर तेज बाइक चलाना और यमराज को न्यौता देना इसकी एक अलग मिसाल बनकर उभरी है। क्या कोई मौत से दोस्ती कर बिंदास होना चाहेगा, कदापि नहीं। पर हमारे युवाओं को भला कौन समझाएं, वे तो इसी को बिंदास होना मानते हैं।तो आप कब बिंदास बन रहे हैं?????